विशेष रिपोर्ट: फाइलों में सुरक्षित, खेतों में लहूलुहान—थ्रेशर हादसों के सरकारी दावों की उतरी पोल! समझौते की मंडी में बिकती हैं मज़दूरों की चीखें; क्या प्रशासन सिर्फ 'एडवाइजरी' जारी कर झाड़ लेता है अपना पल्ला? - ब्रह्मा अनुभूति

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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

विशेष रिपोर्ट: फाइलों में सुरक्षित, खेतों में लहूलुहान—थ्रेशर हादसों के सरकारी दावों की उतरी पोल! समझौते की मंडी में बिकती हैं मज़दूरों की चीखें; क्या प्रशासन सिर्फ 'एडवाइजरी' जारी कर झाड़ लेता है अपना पल्ला?

बिना सावधानी गेहूं कटाई करता किसान



हरदोई/लखनऊ। से अखिल सिंह चंदेल की खास रिपोर्ट 

सुनहरी फसल के बीच जब थ्रेशर की गड़गड़ाहट शुरू होती है, तो प्रशासन की अलमारियों से 'सावधानी' और 'नियमों' की पुरानी फाइलें भी बाहर निकल आती हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि ये नियम केवल अफसरों की मीटिंग और प्रेस नोट तक सीमित हैं। खेतों में आज भी बिना गार्ड वाले पुराने थ्रेशर काल बनकर घूम रहे हैं और मज़दूरों की कटी हुई उंगलियों और टूटे हाथों का हिसाब 'दो-चार हज़ार' के समझौते में दफन हो रहा है।

कागज़ी इंतज़ाम और बेबस किसान
सरकार ने नियम बनाया कि बिना सुरक्षा गार्ड के थ्रेशर नहीं चलेगा, लेकिन क्या कभी किसी अधिकारी ने खेतों में जाकर इन मशीनों की फिटनेस चेक की? सच्चाई यह है कि थ्रेशर से होने वाले 70% हादसे कभी पुलिस रिकॉर्ड तक पहुँचते ही नहीं। गाँव की पगडंडियों पर ही दबंग मालिक और मज़बूर मज़दूर के बीच 'खूनी समझौता' हो जाता है। पुलिस और प्रशासन की सुस्ती इस कदर है कि जब तक कोई बड़ा बवाल न हो, वे संज्ञान लेना ज़रूरी नहीं समझते।

क्या मुआवज़ा सिर्फ कागज़ों पर है?
मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना का ढोल तो ज़ोर-शोर से पीटा जाता है, लेकिन इसकी प्रक्रिया इतनी जटिल है कि अनपढ़ किसान दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते दम तोड़ देता है। बिना FIR के मुआवज़ा मिलता नहीं, और FIR दर्ज कराने में पुलिस का 'सहयोग' जगज़ाहिर है। नतीजा यह कि पीड़ित परिवार प्रशासन की मदद के बजाय मालिक के दिए गए चंद रुपयों को ही अपनी किस्मत मान लेता है।

सरकार से सीधे सवाल: अब और कितनी बलि?
चेकिंग अभियान कहाँ है?: क्यों नहीं तहसील स्तर पर उड़न दस्तों का गठन होता जो हार्वेस्टर और थ्रेशर की सुरक्षा जाँच करें?
लापरवाह मालिकों पर शिकंजा क्यों नहीं?: सिर्फ 'एडवाइजरी' जारी करना काफी नहीं है। क्या प्रशासन उन मशीनों को सीज़ करने का साहस जुटा पाएगा जो मौत का सामान बनी हुई हैं?

समझौतों पर चुप्पी क्यों?: पुलिस को यह बखूबी पता होता है कि किस गाँव में हादसा दबाया गया है, फिर भी 'साक्ष्य के अभाव' का बहाना बनाकर क्यों बैठ जाती है?
वक्त है जागने का—यह सिर्फ 'दुर्घटना' नहीं, 'हत्या' है!

अगर आज सरकार और प्रशासन ने कड़े कदम नहीं उठाए, तो नियम-कायदों की ये किताबें सिर्फ वकीलों की अलमारियों की शोभा बढ़ाएंगी। एक मज़दूर का हाथ कटना सिर्फ उसकी व्यक्तिगत क्षति नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता है।
कानून की आँखों पर बंधी पट्टी अब खुलनी चाहिए। हरदोई से लेकर दिल्ली तक, अगर इन मशीनों पर लगाम नहीं लगी, तो यह 'सुनहरी फसल' हर साल मासूमों के खून से लाल होती रहेगी।
ब्यूरो रिपोर्ट: इंसाफ की आवाज़ (ग्राउंड रिपोर्ट)

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